Faiz Ahmed Faiz – August 1942
अगस्त, १९५२ रौशन कहीं बहार के इमकां हुए तो हैं गुलशन में चाक चन्द गरेबां हुए तो हैं अब भी
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अगस्त, १९५२ रौशन कहीं बहार के इमकां हुए तो हैं गुलशन में चाक चन्द गरेबां हुए तो हैं अब भी
Read Moreईरानी तुलबा के नाम (जो अमन और आज़ादी की जद्द-ओ-जेहद में काम आए) यह कौन सख़ी हैं जिनके लहू की
Read Moreनौहा मुझको शिकवा है मेरे भाई कि तुम जाते हुए ले गए साथ मेरी उम्रे-गुज़िश्ता की किताब उसमें तो मेरी
Read Moreदो इश्क (१) ताज़ा हैं अभी याद में ऐ साकी-ए-गुलफ़ाम वो अकसे-रुख़े-यार से लहके हुए अय्याम वो फूल-सी-खिलती हुयी दीदार
Read Moreतराना दरबार-ए-वतन में जब इक दिन सब जाने वाले जाएंगे कुछ अपनी सज़ा को पहुंचेंगे, कुछ अपनी जज़ा ले जाएंगे
Read Moreतुम्हारे हुस्न के नाम सलाम लिखता है शायर तुम्हारे हुस्न के नाम बिखर गया जो कभी रंगे-पैरहन सरे-बाम निखर गयी
Read Moreदामने-यूसुफ़ जान बेचने को आये तो बे-दाम बेच दी ऐ अहले-मिसर, वज़ए-तकल्लुफ़ तो देखिये इंसाफ़ है कि हुक्मे-अकूबत से पेशतर
Read Moreलौहो-क़लम हम परवरिशे-लौहो-क़लम करते रहेंगे जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे असबाबे-ग़मे-इश्क बहम करते रहेंगे वीरानी-ए-दौराँ पे करम
Read Moreसुब्हे-आज़ादी (अगसत, ‘४७) यह दाग़-दाग़ उजाला, यह शब गज़ीदा सहर वो इंतज़ार था जिसका यह वो सहर तो नहीं यह
Read Moreझील मत छुओ इस झील को। कंकड़ी मारो नहीं, पत्तियाँ डारो नहीं, फूल मत बोरो। और कागज की तरी इसमें
Read Moreचांद का कुर्ता हठ कर बैठा चाँद एक दिन, माता से यह बोला, ‘‘सिलवा दो माँ मुझे ऊन का मोटा
Read Moreमिर्च का मज़ा एक काबुली वाले की कहते हैं लोग कहानी, लाल मिर्च को देख गया भर उसके मुँह में
Read Moreसूरज का ब्याह उड़ी एक अफवाह, सूर्य की शादी होने वाली है, वर के विमल मौर में मोती उषा पिराने
Read Moreनिराकार ईश्वर हर चीज, जो खूबसूरत है, किसी-न-किसी देह में है; सुन्दरता शरीर पाकर हँसती है, और जान हमेशा लहू
Read Moreईश्वर की देह ईश्वर वह प्रेरणा है, जिसे अब तक शरीर नहीं मिल है। टहनी के भीतर अकुल्राता हुआ फूल,
Read Moreबर्र और बालक सो रहा था बर्र एक कहीं एक फूल पर, चुपचाप आके एक बालक ने छू दिया बर्र
Read Moreकाढ़ लो दोनों नयन मेरे काढ़ लो दोनों नयन मेरे, तुम्हारी और अपलक देखना तब भी न छोड़ूँगा । तुम्हारे
Read Moreतुम सड़क पर जा रहे थे तुम सड़क पर जा रहे थे, मैं बगल की वीथि पर; तुम बहुत थे
Read Moreकवि और प्रेमी प्राप्त है इनको सखे! कुछ ज्ञान भी, अज्ञान भी। वायु हैं ये, विश्व के मन को बहा
Read Moreनाम तुम कहाँ से आ रहे हो? नाम क्या है? वह पुकारु शब्द मत मुझको बताओ, जो तुम्हारा आवरण है
Read Moreपढ़क्कू की सूझ एक पढ़क्कू बड़े तेज थे, तर्कशास्त्र पढ़ते थे, जहाँ न कोई बात, वहाँ भी नए बात गढ़ते
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