Javed Akhtar – Bhookh


आँख खुल गई मेरी
हो गया मैं फिर ज़िन्दा
पेट के अन्धेरो से
ज़हन के धुन्धलको तक
एक साँप के जैसा
रेंगता खयाल आया
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है।

एक अजीब खामोशी
से भरा हुआ कमरा
कैसा खाली-खाली है मेज़ जगह पर रखी है
कुर्सी जगह पर रखी है
फर्श जगह पर रखी है अपनी जगह पर
ये छत अपनी जगह दीवारें
मुझसे बेताल्लुक सब,
सब मेरे तमाशाई है
सामने की खिड़की से
तीज़ धूप की किरने
आ रही हैं बिस्तर पर
चुभ रही हैं चेहरे में
इस कदर नुकीली हैं
जैसे रिश्तेदारों के
तंज़ मेरी गुर्बत पर
आँख खुल गई मेरी
आज खोखला हूँ मै सिर्फ खोल बाकी है
आज मेरे बिस्तर में
लेटा है मेरा ढाँचा
अपनी मुर्दा आँखों से
देखता है कमरे को
एक सर्द सन्नाटा
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है।

दोपहर की गर्मी में
बेइरादा क़दमों से
इस सड़क पे चलता हूँ
तंग-सी सड़क पर हैं
दोनों सम्त दूकानें
ख़ाली ख़ाली आँखों से
हर दुकान का तख़्ता
सिर्फ़ देख सकता हूँ
अब पढ़ा नहीं जाता
लोग आते जाते हैं
पास से गुज़रते हैं
फिर भी कितने घुँधले हैं
सब है जैसे बेचेहरा
शोर इन दूकानों का
राह चलती इक गाली
रेडियो की आवाज़ें
दूर की सदाएँ हैं
आ रही है मीलों से
जो भी सुन रहा हूँ मैं
जो भी देखता हूँ मैं
ख़्वाब जैसा लगता है
है भी और नहीं भी है
दोपहर की गर्मी में
बेइरादा कदमों से
इक सड़क पे चलता हूँ
सामने के नुक्कड़ पर
नल दिखायी देता है
सख़्त क्यों है ये पानी
क्यों गले में फँसता है
मेरे पेट में जैसे
घूँसा एक लगता है
आ रहा है चक्कर-सा
जिस्म पर पसीना है
अब सकत नहीं बाक़ी
आज तीसरा दिन है
आज तीसरा दिन है।

हर तरफ़ अँधेरा है
घाट पर अकेला हूँ
सीढ़ियाँ हैं पत्थर की
सीढ़ियों पे लेटा हूँ
अब मैं उठ नहीं सकता
आसमाँ को तकता हूँ
आसमाँ की थाली में
चाँद एक रोटी है
झुक रही हैं अब पलकें
डूबता है ये मंज़र
है ज़मीन गर्दिश में

मेरे घर में चूल्हा था
रोज़ खाना पकता था
रोटियाँ सुनहरी हैं
गर्म गर्म ये खाना
खुल नहीं नहीं आँखें
क्या मैं मरनेवाला हूँ
माँ अजीब थी मेरी
रोज़ अपने हाथों से
मुझको वो खिलाती थी
कौन सर्द हाथों से
छू रहा है चेहरे को
इक निवाला हाथी का
इक निवाला घोड़े का
इक निवाला भालू का
मौत है कि बेहोशी
जो भी है ग़नीमत है
आज तीसरा दिन था,
आज तीसरा दिन था।


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