Mirza Ghalib – Ibne mariyam hua kare koi


इबने-मरियम हुआ करे कोई
मेरे दुख की दवा करे कोई

शरअ-ओ-आईन पर मदार सही
ऐसे कातिल का क्या करे कोई

चाल, जैसे कड़ी कमां का तीर
दिल में ऐसे के जा करे कोई

बात पर वां ज़बान कटती है
वो कहें और सुना करे कोई

बक रहा हूं जुनूं में क्या-क्या कुछ
कुछ न समझे ख़ुदा करे कोई

न सुनो गर बुरा कहे कोई
न कहो गर बुरा करे कोई

रोक लो, गर ग़लत चले कोई
बख़श दो गर ख़ता करे कोई

कौन है जो नहीं है हाजतमन्द
किसकी हाजत रवा करे कोई

क्या किया ख़िज्र ने सिकन्दर से
अब किसे रहनुमा करे कोई

जब तवक्को ही उठ गयी ‘ग़ालिब’
कयों किसी का गिला करे कोई


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