Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Taraana 2


तराना-2

हम देखेंगे
लाज़िम है कि हम भी देखेंगे
वोह दिन के जिसका वादा है
जो लौहे अज़ल में लिक्खा है
जब ज़ुलमो-सितम के कोहे-गरां
रूयी की तरह उड़ जायेंगे
हम महकूमों के पांव तले
जब धरती धड़-धड़ धड़केगी
और अहले-हिकम के सर ऊपर
जब बिजली कड़कड़ कड़केगी
जब अरज़-ए-ख़ुदा के काबे से
सब बुत उठवाये जाएंगे
हम अहले-सफ़ा, मरदूद-ए-हरम
मसनद पे बिठाये जायेंगे
सब ताज उछाले जायेंगे
सब तख़त गिराये जायेंगे
बस नाम रहेगा अल्लाह का
जो ग़ायब भी है हाज़िर भी
जो मंज़र भी है नाज़िर भी
उट्ठेगा ‘अनलहक’ का नारा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो
और राज करेगी ख़लके-ख़ुदा
जो मैं भी हूं और तुम भी हो

(लौहे अज़ल=पहले से लिखा,
किस्मत, कोहे-गरां=भारी पहाड़,
महकूम=दलित, अहले-हिकम=
हाकिम, अर्ज=ज़मीन, अहले-सफ़ा=
साफ़ लोग, मरदूद-ए-हरम=जिन की
कट्टड़पंथी निंदा करते हैं, मंजर=दृश्य,
नाजिर=दर्शक, अनलहक=मैं सत्य हूँ,
ख़लके-ख़ुदा=आम लोग)