Ramdhari Singh Dinkar – Kaling vijaya
कलिंग-विजय (1) युद्ध की इति हो गई; रण-भू श्रमित, सुनसान; गिरिशिखर पर थम गया है डूबता दिनमान– देखते यम का
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कलिंग-विजय (1) युद्ध की इति हो गई; रण-भू श्रमित, सुनसान; गिरिशिखर पर थम गया है डूबता दिनमान– देखते यम का
Read Moreअन्तिम मनुष्य सारी दुनिया उजड़ चुकी है, गुजर चुका है मेला; ऊपर है बीमार सूर्य नीचे मैं मनुज अकेला। बाल-उमंगों
Read Moreजा रही देवता से मिलने? जा रही देवता से मिलने? तो इतनी कृपा किये जाओ। अपनी फूलों की डाली में
Read Moreअतीत के द्वार पर ‘जय हो’, खोलो अजिर-द्वार मेरे अतीत ओ अभिमानी! बाहर खड़ी लिये नीराजन कब से भावों की
Read Moreहे मेरे स्वदेश! छिप जाऊँ कहाँ तुम्हें लेकर? इस विष का क्या उपचार करूँ? प्यारे स्वदेश! खाली आऊँ? या हाथों
Read Moreरात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद रात यों कहने लगा मुझसे गगन का चाँद, आदमी भी क्या अनोखा
Read Moreबटोही, धीरे-धीरे गा बटोही, धीरे-धीरे गा। बोल रही जो आग उबल तेरे दर्दीले सुर में, कुछ वैसी ही शिखा एक
Read Moreवह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है वह प्रदीप जो दीख रहा है झिलमिल, दूर नहीं है;
Read Moreओ अशेष! निःशेष बीन का एक तार था मैं ही (1) ओ अशेष! निःशेष बीन का एक तार था मैं
Read Moreप्रतिकूल (1) है बीत रहा विपरीत ग्रहों का लग्न-याम; मेरे उन्मादक भाव, आज तुम लो विराम। उन्नत सिर पर जब
Read Moreआग की भीख (1) धुँधली हुईं दिशाएँ, छाने लगा कुहासा, कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँ-सा। कोई मुझे बता
Read Moreजनता मत खेलो यों बेखबरी में, जनता फूल नहीं है। और नहीं हिन्दू-कुल की अबला सतवन्ती नारी, जो न भूलती
Read Moreस्वाधीन भारती की सेना जाग रहे हम वीर जवान, जियो जियो अय हिन्दुस्तान ! (1) हम प्रभात की नई किरण
Read Moreअरुणोदय (15 अगस्त, सन् 1947 को स्वतंत्रता के स्वागत में रचित) नई ज्योति से भींग रहा उदयाचल का आकाश, जय
Read Moreरोटी और स्वाधीनता (अय ताइरे-लाहूती ! उस रिज़्क से मौत अच्छी, जिस रिज़्क से आती हो परवाज़ में कोताही।-इक़बाल) (1)
Read Moreनेता नेता ! नेता ! नेता ! क्या चाहिए तुझे रे मूरख ! सखा ? बन्धु ? सहचर ? अनुरागी
Read Moreजवानी का झण्डा घटा फाड़ कर जगमगाता हुआ आ गया देख, ज्वाला का बान; खड़ा हो, जवानी का झंडा उड़ा,
Read Moreपंचतिक्त (1) चीलों का झुंड उचक्का है, लोभी, बेरहम, लुटेरा भी; रोटियाँ देख कमज़ोरों पर क्यों नहीं झपट्टे मारेगा ?
Read Moreव्यष्टि तुम जो कहते हो, हम भी हैं चाहते वही, हम दोनों की किस्मत है एक दहाने में, है फर्क
Read Moreनिराशावादी पर्वत पर, शायद, वृक्ष न कोई शेष बचा, धरती पर, शायद, शेष बची है नहीं घास; उड़ गया भाप
Read Moreराहु चेतनाहीन ये फूल तड़पना क्या जानें ? जब भी आ जाती हवा की पग बढाते हैं । झूलते रात
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