Suryakant Tripathi Nirala – Laghu tatini , tatt chaayi kaliyaan
लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां; गूँजी अलियों की आवलियाँ। तरियों की परियाँ हैं जल पर, गाती हैं
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लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां लघु-तटिनी, तट छाईं कलियां; गूँजी अलियों की आवलियाँ। तरियों की परियाँ हैं जल पर, गाती हैं
Read Moreचलीं निशि में तुम आई प्रात चलीं निशि में तुम आई प्रात; नवल वीक्षण, नवकर सम्पात, नूपुर के निक्वण कूजे
Read Moreप्रिय के हाथ लगाये जागी प्रिय के हाथ लगाये जागी, ऐसी मैं सो गई अभागी। हरसिंगार के फूल झर गये,
Read Moreतुमने स्वर के आलोक-ढले तुमने स्वर के आलोक-ढले गाये हैं गाने गले-गले। बचकर भव की भंगुरता से रागों के सुमनों
Read Moreवन-वन के झरे पात वन-वन के झरे पात, नग्न हुई विजन-गात। जैसे छाया के क्षण हंसा किसी को उपवन, अब
Read Moreतुमसे जो मिले नयन तुमसे जो मिले नयन, दूर हुए दुरित-शयन। खिले अंग-अंग अमल सर के पातः-शतदल पावन-पवनोत्कल-पल, अलक-मन्द-गन्ध-वयन। खग-कुल
Read Moreवेदना बनी मेरी अवनी वेदना बनी; मेरी अवनी। कठिन-कठिन हुए मृदुल पद-कमल विपद संकल भूमि हुई शयन-तुमुल कण्टकों घनी। तुमने
Read Moreहरि का मन से गुणगान करो हरि का मन से गुणगान करो, तुम और गुमान करो, न करो। स्वर-गंगा का
Read Moreआंख बचाते हो तो क्या आते हो आँख बचाते हो तो क्या आते हो? काम हमारा बिगड़ गया देखा रूप
Read Moreलिया-दिया तुमसे मेरा था लिया-दिया तुमसे मेरा था, दुनिया सपने का डेरा था। अपने चक्कर से कुल कट गये, काम
Read Moreगीत गाने दो मुझे तो गीत गाने दो मुझे तो, वेदना को रोकने को। चोट खाकर राह चलते होश के
Read Moreसहज-सहज कर दो सहज-सहज कर दो; सकलश रस भर दो। ठग ठगकर मन को लूट गये धन को, ऐसा असमंजस,
Read Moreछोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े छोड़ दो, न छेड़ो टेढ़े, कब बसे तुम्हारे खेड़े? यह राह तुम्हारी कब की जिसको
Read Moreकौन गुमान करो जिन्दगी का कौन गुमान करो जिन्दगी का? जो कुछ है कुल मान उन्हीं का। बाँधे हुए घर-बार
Read Moreये दुख के दिन काटे हैं जिसने ये दुख के दिन काटे हैं जिसने गिन गिनकर पल-छिन, तिन-तिन। आँसू की
Read Moreवासना-समासीना, महती जगती दीना वासना-समासीना, महती जगती दीना। जलद-पयोधर-भारा, रवि-शशि-तारक-हारा, व्योम-मुखच्छबिसारा शतधारा पथ-हीना। ॠषिकुल-कल-कण्ठस्तुति, दिव्य-शस्य-सकलाहुति, निगमागम-शास्त्रश्रुति रासभ-वासव-वीणा।
Read Moreनव तन कनक-किरण फूटी है नव तन कनक-किरण फूटी है। दुर्जय भय-बाधा छूटी है। प्रात धवल-कलि गात निरामय मधु-मकरन्द-गन्ध विशदाशय,
Read Moreघन तम से आवृत धरणी है घन तम से आवृत धरणी है; तुमुल तरंगों की तरणी है। मन्दिर में बन्दी
Read Moreक्यों मुझको तुम भूल गये हो क्यों मुझको तुम भूल गये हो? काट डाल क्या, मूल गये हो। रवि की
Read Moreपाप तुम्हारे पांव पड़ा था पाप तुम्हारे पांव पड़ा था, हाथ जोड़कर ठांव खड़ा था। विगत युगों का जंग लगा
Read Moreनव जीवन की बीन बजाई नव जीवन की बीन बजाई। प्रात रागिनी क्षीण बजाई। घर-घर नये-नये मुख, नव कर, भरकर
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