Faiz Ahmed Faiz – Jo mera tumhara rishta hai
जो मेरा तुम्हारा रिश्ता है
मैं क्या लिखूं कि जो मेरा तुम्हारा रिशता है
वो आशिकी की ज़बां में कहीं भी दरज नहीं
लिखा गया है बहुत लुतफ़े-वसलो-दर्दे-फ़िराक
मगर ये कैफ़ियत अपनी रकम नहीं है कहीं
ये अपना इश्क हम आग़ोश जिस में हिजरो-विसाल
ये अपना दर्द कि है कब से हमदमे-महो-साल
इस इश्के-ख़ास को हर एक से छुपाये हुए
गुज़र गया है ज़माना गले लगाये हुए
ताशकन्द, १९८१
(लुतफ़े-वसलो-दर्दे-फ़िराक=मिलने की ख़ुशी,
विरह का दुख, रकम=लिखी, आग़ोश=गले में बाहें)
विरह का दुख, रकम=लिखी, आग़ोश=गले में बाहें)