Mirza Ghalib – Zakham par chidkein kahan tiflan ae beparwah namak
ज़ख़्म पर छिड़कें कहां तिफ़लान-ए-बेपरवा नमक
क्या मज़ा होता अगर पत्थर में भी होता नमक
गरद-ए-राह-ए-यार है सामान-ए-नाज़-ए-ज़ख़्म-ए-दिल
वरना होता है जहां में किस कदर पैदा नमक
मुझ को अरज़ानी रहे तुझ को मुबारक हो जयूं
नाला-ए-बुलबुल का दर्द और ख़न्दा-ए-गुल का नमक
शोर-ए-जौलां था कनार-ए-बहर पर किस का कि आज
गरद-ए-साहल है ब-ज़ख़्म-ए-मौज-ए-दरिया नमक
दाद देता है मेरे ज़ख़्म-ए-जिगर की वाह वाह
याद करता है मुझे देखे है वो जिस जा नमक
छोड़ कर जाना तन-ए-मजरूह-ए-आशिक हैफ़ है
दिल तलब करता है ज़ख़्म और मांगे हैं आज़ा नमक
ग़ैर की मिन्नत न खींचूंगा पय-ए-तौफ़ीर-ए-दर्द
ज़ख़्म मिसल-ए-ख़न्दा-ए-कातिल है सर-ता-पा नमक
याद हैं ‘ग़ालिब’ तुझे वो दिन कि वजद-ए-ज़ौक में
ज़ख़्म से गिरता तो मैं पलकों से चुनता था नमक