Hindi Poetry

Javed Akhtar – Kabhi kabhi mai yeh sochta hoon ki mujhko teri talaash kyu hai


कभी-कभी मैं ये सोचता हूँ कि मुझको तेरी तलाश क्यों है
कि जब हैं सारे ही तार टूटे तो साज़ में इरतेआश क्यों है

कोई अगर पूछता ये हमसे, बताते हम गर तो क्या बताते
भला हो सब का कि ये न पूछा कि दिल पे ऐसी ख़राश क्यों है

उठाके हाथों से तुमने छोड़ा, चलो न दानिस्ता तुमने तोड़ा
अब उल्टा हमसे तो ये न पूछो कि शीशा ये पाश-पाश क्यों है

अजब दोराहे पे ज़िंदगी है कभी हवस दिल को खींचती है
कभी ये शर्मिंदगी है दिल में कि इतनी फ़िक्रे-मआश क्यों है

न फ़िक्र कोई न जुस्तुजू है, न ख्वाब कोई न आरज़ू है
ये शख्स तो कब का मर चुका है, तो बेकफ़न फिर ये लाश क्यों है