Hindi Poetry

Javed Akhtar – Dastbardaar agar aap gazab se ho jayein


दस्तबरदार अगर आप ग़ज़ब से हो जाएं
हर सितम भूलके हम आपके अब से हो जाएं

चौदहवीं शब है तो खिड़की के गिरा दो पर्दे
कौन जाने कि वो नाराज़ ही शब से हो जाएं

एक ख़ुश्बू की तरह फैलते हैं महिफ़ल में
ऐसे अल्फ़ाज़ अदा जो तिरे लब से हो जाएं

न कोई इश्क़ है बाक़ी न कोई परचम है
लोग दीवाने भला किसके सबब से हो जाएं

बाँध लो हाथ कि फैलें न किसी के आगे
सी लो ये लब कि कहीं वा न तलब से हो जाएं

बात तो छेड़ मिरे दिल, कोई क़िस्सा तो सुना
क्या अजब उन के भी जज़्बात अजब से हो जाएं