Hindi Poetry

Gulzar – Kharchi


खर्ची

मुझे खर्ची में पूरा एक दिन, हर रोज मिलता है
मगर हर रोज कोई छीन लेता है
झपट लेता है अंटी से…..
कभी खीसे से गिर पड़ता है
तो गिरने की आहट भी नहीं होती
खरे दिन को भी खोटा समझ कर भूल जाता हूँ मै

गिरेबान से पकड़ कर मांगने वाले भी मिलते है
“तेरी गुजरी हुई पुश्तो का कर्जा है , तुझे किश्तें चुकानी है”
जबरदस्ती कोई गिरबी रख लेता है ये कहकर
अभी दो चार लम्हे खर्च करने के लिए रख ले
बकाया उम्र के खाते मे लिख देते है
जब होगा, हिसाब होगा
बड़ी हसरत है पूरा एक दिन एक बार मैं
अपने लिए रख लूँ
तुम्हारे साथ पूरा, एक दिन बस खर्च करने की तमन्ना है