Hindi Poetry

Suryakant Tripathi Nirala – Tarni taar do apar paar ko


तरणि तार दो अपर पार को

तरणि तार दो
अपर पार को

खे-खेकर थके हाथ,
कोई भी नहीं साथ,
श्रम-सीकर-भरा माथ,
बीच-धार, ओ!

पार किया तो कानन;
मुरझाया जो आनन,
आओ हे निर्वारण,
बिपत वार लो।

पड़ी भँवर-बीच नाव,
भूले हैं सभी दांव,
रुकता है नहीं राव–
सलिल-सार, ओ!