Hindi Poetry

Suryakant Tripathi Nirala – Haar gyi main tumhein jgaakar


हार गई मैं तुम्हें जगाकर

हार गई मैं तुम्हें जगाकर,
धूप चढ़ी प्रखर से प्रखरतर।

वर्जन के जो वज्र-द्वार हैं,
क्या खुलने के भी किंवार हैं?
प्राण पवन से पार-पार हैं,
जैसे दिनकर निष्कर, निश्शर।

पंच विपंची से विहीन हैं;
जैसे जन आयु से छीण हैं;
सभी विरोधाभास पीन हैं;
असमय के जैसे धाराधर।