Hindi Poetry

Suryakant Tripathi Nirala – Aur na ab bharmaao


और न अब भरमाओ

और न अब भरमाओ,
पौर आओ, तुम आओ!

जी की जो तुमसे चटकी है,
बुद्धि-शुद्धि भटकी-भटकी है;
और जनों की लट लटकी है?
ऐसे अकेले बचाओ,
छोड़कर दूर न जाओ।

खाली पूरे हाथ गये हैं,
ऊपर नये-नये उनये हैं,
सुख से मिलें जो दुख-दुनये हैं,
बेर न वीर लगाओ,
बढ़ाकर हाथ बटाओ!