Mirza Ghalib – Dard mitrat kshe dva na hua
दर्द मिन्नत-कशे-दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ जमा करते हो कयों रकीबों को ? इक तमाशा
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दर्द मिन्नत-कशे-दवा न हुआ मैं न अच्छा हुआ, बुरा न हुआ जमा करते हो कयों रकीबों को ? इक तमाशा
Read Moreबस कि दुशवार है हर काम का आसां होना आदमी को भी मयस्सर नहीं इनसां होना गिरीया चाहे है खराबी
Read Moreआह को चाहिये इक उम्र असर होने तक कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होने तक दाम हर मौज
Read Moreक्षमा करो बापू! तुम हमको, बचन भंग के हम अपराधी, राजघाट को किया अपावन, मंज़िल भूले, यात्रा आधी। जयप्रकाश जी!
Read Moreचौराहे पर लुटता चीर प्यादे से पिट गया वजीर चलूँ आखिरी चाल कि बाजी छोड़ विरक्ति सजाऊँ? राह कौन सी
Read Moreबेनकाब चेहरे हैं, दाग बड़े गहरे हैं, टूटता तिलस्म, आज सच से भय खाता हूँ । गीत नही गाता हूँ
Read Moreऊँचे पहाड़ पर, पेड़ नहीं लगते, पौधे नहीं उगते, न घास ही जमती है। जमती है सिर्फ बर्फ, जो, कफ़न
Read Moreमुझे दूर का दिखाई देता है, मैं दीवार पर लिखा पढ़ सकता हूँ, मगर हाथ की रेखाएं नहीं पढ़ पाता।
Read Moreजीवन की डोर छोर छूने को मचली, जाड़े की धूप स्वर्ण कलशों से फिसली, अन्तर की अमराई सोई पड़ी शहनाई,
Read Moreहिन्दु महोदधि की छाती में धधकी अपमानों की ज्वाला और आज आसेतु हिमाचल मूर्तिमान हृदयों की माला । सागर की
Read Moreआज़ादी का दिन मना, नई ग़ुलामी बीच; सूखी धरती, सूना अंबर, मन-आंगन में कीच; मन-आंगम में कीच, कमल सारे मुरझाए;
Read Moreक्या सच है, क्या शिव, क्या सुंदर? शव का अर्चन, शिव का वर्जन, कहूँ विसंगति या रूपांतर? वैभव दूना, अंतर
Read Moreबढ़ते जाते देखो हम बढ़ते ही जाते॥ उज्वलतर उज्वलतम होती है महासंगठन की ज्वाला प्रतिपल बढ़ती ही जाती है चंडी
Read Moreअपने आदर्शों और विश्वासों के लिए काम करते-करते, मृत्यु का वरण करना सदैव ही स्पृहणीय है। किन्तु वे लोग सचमुच
Read Moreकवि आज सुना वह गान रे, जिससे खुल जाएँ अलस पलक। नस–नस में जीवन झंकृत हो, हो अंग–अंग में जोश
Read Moreअनुशासन का पर्व है, बाबा का उपदेश; हवालात की हवा भी देती यह सन्देश: देती यह सन्देश, राज डण्डे से
Read Moreबेचैनी की रात, प्रात भी नहीं सुहाता; घिरी घटा घनघोर, न कोई पंछी गाता; तन भारी, मन खिन्न, जागता दर्द
Read Moreतंग आ गए हैं क्या करें इस ज़िंदगी से हम घबरा के पूछते हैं अकेले में जी से हम मजबूरियों
Read Moreठन गई! मौत से ठन गई! जूझने का मेरा इरादा न था, मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था, रास्ता
Read Moreन मैं चुप हूँ न गाता हूँ सवेरा है मगर पूरब दिशा में घिर रहे बादल रूई से धुंधलके में
Read Moreकौरव कौन कौन पांडव, टेढ़ा सवाल है। दोनों ओर शकुनि का फैला कूटजाल है। धर्मराज ने छोड़ी नहीं जुए की
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