Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Dhaka se vaapsi par


ढाका से वापसी पर

हम केः ठहरे अजनबी इतनी मदारातों के बाद
फिर बनेंगे आशना कितनी मुलाक़ातों के बाद

कब नज़र में आयेगी बे-दाग़ सब्ज़े की बहार
ख़ून के धब्बे धुलेंगे कितनी बरसातों के बाद

थे बहुत बे-दर्द लम्हे ख़त्मे-दर्दे-इश्क़ के
थीं बहुत बे-मह्‍र सुब्हें मह्‍रबाँ रातों के बाद

दिल तो चाहा पर शिकस्ते-दिल ने मोहलत ही न दी
कुछ गिले-शिकवे भी कर लेते, मुनाजातों के बाद

उनसे जो कहने गए थे “फ़ैज़” जाँ सदक़ा किए
अनकही ही रह गई वो बात सब बातों के बाद

(मदारातों=आवभगत, आशना=परिचित,
लम्हे ख़त्मे-दर्दे-इश्क़=प्रेम की पीड़ा की
समाप्ति के क्षण, बे-मह्‍र=निर्दई, शिकस्ते-
दिल=दिल की हार, मोहलत=अवकाश,
मुनाजातों=प्रार्थना-गीत,जाँ सदक़ा=प्राण
न्यौछावर)