Faiz Ahmed Faiz – Ishq apne muzrimon ko pa-b-jaulaun le chala
इश्क अपने मुजरिमों को पा-ब-जौलां ले चला
दार की रस्सियों के गुलूबन्द गर्दन में पहने हुए
गानेवाले इक रोज़ गाते रहे
पायलें बेड़ियों की बजाते हुए
नाचनेवाले धूमें मचाते रहे
हम जो न इस सफ़ में थे और न उस सफ़ में थे
रास्ते में खड़े उनको तकते रहे
रशक करते रहे
और चुपचाप आंसू बहाते रहे
लौटकर आ के देखा तो फूलों का रंग
जो कभी सुरख़ था ज़रद ही ज़रद है
अपना पहलू टटोला तो ऐसा लगा
दिल जहां था वहां दर्द ही दर्द है
गले में कभी तौक का वाहमा
कभी पांव में लमस ज़ंजीर का
और फिर एक दिन इश्क उनहीं की तरह
रसन-दर-गुलू, पा-ब-जौलां हमें
इसी काफ़िले में कशां ले चला
बेरूत, अगसत, १९८१
(पा-ब-जौलां=पैरों में बेड़ियां डाले, रशक=
ईर्ष्या, लमस=छुवन, रसन-दर-गुलू=गले में
रस्सी, कशां=खींचते हुए)
ईर्ष्या, लमस=छुवन, रसन-दर-गुलू=गले में
रस्सी, कशां=खींचते हुए)