Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Khwaab ae pareeshaan


ख़्वाबे-परीशाँ

हां ख़्वाहिश कि बीमार मेरे तनहा दिल ने
इक ख़्वाब सभी ख़्वाबों की तरह प्यारा देखा
लेकिन मेरे सब ख़्वाबों की तरह
ये ख़्वाब भी बे-मानी निकला
ये ख़्वाब कि बन जाऊंगा किसी दिन
बोरडिंग का मानीटर मैं

हैरत कि हुआ ऐसा ही मगर
थी किस को ख़बर
इस मोड़ पे आके बख़ते-रसा सो जायेगा
ज़ीनों की सदा आसेब-ज़दा
हम्माम में ग़म की गर्द अटी
और एक नहूसत का पैकर
मीनार घड़ी
हर घंटा कराही वक़्त के लम्बे रस्ते पर
आवाज़ थकन में डूबी हुई थी
मैं, गुरमुख सिंह सुनता ही रहा

सुन-सुन के मगर ये कहना पड़ा
ये ख़्वाब भी कितना मोहमल था

(ख़्वाबे-परीशाँ=फ़िज़ूल स्वप्न, बख़ते-रसा=
सुभाग, आसेब-ज़दा =भूतों जैसी, नहूसत
का पैकर=मनहूस शकल, मोहमल=फ़िज़ूल)