Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Kis shehar


 किस शह्‍र न शोहरा हुआ नादानी-ए-दिल का

किस शह्‍र न शोहरा हुआ नादानी-ए-दिल का
किस पर न खुला राज़ परीशानी-ए-दिल का

आयो करें महफ़िल पे ज़रे-ज़ख़्म नुमायां
चर्चा है बहुत बे-सरो-सामानी-ए-दिल का

देख आयें चलो कूए-निगारां का ख़राबा
शायद कोई महरम मिले वीरानी-ए-दिल का

पूछो तो इधर तीरफ़िगन कौन है यारो
सौंपा था जिसे काम निगहबानी-ए-दिल का

देखो तो किधर आज रुख़े-बादे-सबा है
किस रह से पयाम आया है ज़िन्दानी-ए-दिल का

उतरे थे कभी ‘फ़ैज़’ वो आईना-ए-दिल में,
आलम है वही आज भी हैरानी-ए-दिल का

(शोहरा=मशहूरी, कूए-निगारां=प्रेमिका की गली,
तीरफ़िगन=तीर चलाने वाला, ज़िन्दानी=कैदी)