Faiz Ahmed Faiz – Nazar
नज्र
तरबज़ारे-तख़य्युल शौके-रंगीकार की दुनिया
मिरे अफ़कार की जन्नत, मिरे अशआर की दुनिया
शबे-महताब की सहर आफ़रीं मदहोश मौसीकी
तुम्हारी दिलनशीं आवाज़ में आराम करती है
बहार आग़ोश में बहकी हुई रंगीनीयां लेकर
तुम्हारे ख़न्दा-ए-गुलरेज़ को बदनाम करती है
तुम्हारी अम्बरीं ज़ुल्फ़ों में लाखों फ़ितने आवारा
तुम्हारी हर नज़र से सैंकड़ों सागर छलकते हैं
तुम्हारा दिल हसीं जज़बों से यूं आबाद है गोया
शफ़क ज़ारे-जवानी में फ़रिश्ते रक़्स करते हैं
जहाने-आरज़ू ये बेरुख़ी देखी नहीं जाती
कि शौके-दीद को तुम इस तरह बेसूद कर डालो
बहशते-रंगो-बू रानाईयां महदूद कर डालो
नहीफ़ आंखों में इतनी दिलकशी देखी नहीं जाती