Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – nNa ab rakeeb na naseh na gamgusaar koi


न अब रकीब न नासेह न ग़मगुसार कोई

न अब रकीब न नासेह न ग़मगुसार कोई
तुम आशना थे तो थीं आशनाईयां क्या-क्या

जुदा थे हम तो मुयस्सर थीं कुरबतें कितनी
बहम हुए तो पड़ी हैं जुदाईयां क्या-क्या

पहुंच के दर पर तिरे कितने मो’तबर ठहरे
अगरचे रह में हुईं जगहंसाईयां क्या-क्या

हम-ऐसे सादा-दिलों की नियाज़मन्दी से
बुतों ने की हैं जहां में बुराईयां क्या-क्या

सितम पे ख़ुश कभी लुतफ़ो-करम से रंजीदा
सिखाईं तुमने हमें कजअदाईयां क्या-क्या

(नासेह=प्रचारक, कुरबत=नज़दीकी, बहम=
इकठ्ठा, मो’तबर=भरोसेयोग, नियाज़मन्दी=
प्रेम भक्ति, कजअदाई=बाँकी अदा)