फूल मुर्झा गये हैं सारे
फूल मुर्झा गये हैं सारे
थमते नहीं हैं आसमां के आंसू
शमएं बेनूर हो गई हैं
आईने चूर हो गए हैं
साज़ सब बज के खो गए हैं
पायलें बुझ के सो गई हैं
और इन बादलों के पीछे
दूर इस रात का दुलारा
दर्द का सितारा
टिमटिमा रहा है
झनझना रहा है
मुस्कुरा रहा है
लन्दन, १९७८