Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Sehra ki raat


सहरा की रात

कहीं भी शबनम कहीं नहीं है
अजब कि शबनम कहीं नहीं है
न सर्द ख़ुर्शीद की जबीं पर
किसी के रुख़ पर न आसतीं पर
ज़रा-सी शबनम कहीं नहीं है

पिसे हुए पत्थरों की मौजें
ख़मोश-ओ-साकिन
हरारते-माहे-नीम शब में सुलग रही हैं
और शबनम कहीं नहीं है

बरहना-पा ग़ोल गीदड़ों के
लगा रहे हैं बनों में ठट्ठे
कि आज शबनम कहीं नहीं है

बबूल के इसतख़वां के ढांचे
पुकारते हैं
नहीं है शबनम, कहीं नहीं है

सफ़ैद, धुंधलायी रौशनी में
हैं दशत की छातियां बरहना
तरस रही हैं जो हुसने-इंसां लिये
कि शबनम का एक कतरा
कहीं पे बरसे

ये चांद भी सर्द हो रहेगा
उफ़क पे जब सुबह का किनारा
किसी किरन से दहक उठेगा
कि एक दरमांदा राहरौ की
जबीं पे शबनम का हाथ चमके

(जबीं=माथा, रुख़=मुँह, साकिन=
स्थिर, हरारते-माहे-नीम शब=आधी
रात के चाँद की गर्मी, बरहना-पा
ग़ोल=नंगे पैर झुंड, इसतख़वां=
हड्डियों, दशत=जंगल, दरमांदा
राहरौ=थका राही)