Faiz Ahmed Faiz – Zinda se ik khat
ज़िन्दां से एक ख़त
मेरी जां तुझको बतलाऊं बहुत नाज़ुक येह नुक़्ता है
बदल जात है इंसां जब मकां उसका बदलता है
मुझे ज़िन्दां में प्यार आने लगा है अपने ख़्वाबों पर
जो शब को नींद अपने मेहरबां हाथों से
वा करती है दर उसका
तो आ गिरती है हर दीवार उसकी मेरे कदमों पर
मैं ऐसे ग़रक हो जाता हूं इस दम अपने ख़्वाबों में
कि जैसे इक किरन ठहरे हुए पानी पे गिरती है
मैं इन लमहों में कितना सरख़ुश-ओ-दिलशाद फिरता हूं
जहां की जगमगाती वुसअतों में किस कदर आज़ाद फिरता हूं
जहां दर्द-ओ-अलम का नाम है कोई न ज़िन्दां है
“तो फिर बेदार होना किस कदर तुम पर गरां होगा”
नहीं ऐसा नहीं है मेरी जां मेरा येह किस्सा है
मैं अपने अज़म-ओ-हिम्मत से
वही कुछ बख़शता हू नींद को जो उसका हिस्सा है
(सरख़ुश-ओ-दिलशाद=हंसमुख, वुसअत=फैलाव,
ज़िन्दां=जेल, बेदार=जागना, गरां=भारी, अज़म=संकलप)