Hindi Poetry

Gulzar – Virasat


अपनी मर्ज़ी से तो मज़हब भी नहीं उस ने चुना था
उस का मज़हब था जो माँ बाप से ही उस ने विरासत में लिया था

अपने माँ बाप चुने कोई ये मुमकिन ही कहाँ है?
उस पे ये मुल्क भी लाज़िम था कि माँ बाप का घर था इस में
ये वतन उस का चुनाव तो नहीं था…

वो तो कल नौ ही बरस का था, उसे क्यूँ चुन कर
फ़िर्का-वाराना फ़सादात ने कल क़त्ल किया।।।!