Hindi Poetry

Javed Akhtar – Ajeeb aadmi tha woh


अजीब आदमी था वो
मुहब्बतों का गीत था,
बग़ावतों का राग था
कभी वो सिर्फ़ फूल था
कभी वो सिर्फ़ आग था
अजीब आदमी था वो

वो मुफ़लिसों से कहता था
कि दिन बदल भी सकते हैं
वो जाबिरों से कहता था
तुम्हारे सर पे सोने के जो ताज हैं
कभी पिघल भी सकते हैं

वो बंदिशों से कहता था
मैं तुमको तोड़ सकता हूँ
सहूलतों से कहता था
मैं तुमको छोड़ सकता हूँ
हवाओं से वो कहता था
मैं तुमको मोड़ सकता हूँ

वो ख्वाब से ये कहता था
कि तुझको सच करूँगा मैं
वो आरज़ू से कहता था
मैं तेरा हमसफ़र हूँ
तेरे साथ ही चलूँगा मैं
तू चाहे जितनी दूर भी
बना ले अपनी मंज़लें
कभी नहीं थकूँगा मैं

वो ज़िंदगी से कहता था
कि तुझको मैं सजाऊँगा
तू मुझसे चाँद माँग ले
मैं चाँद लेके आऊँगा

वो आदमी से कहता था
कि आदमी से प्यार कर
उजड़ रही है ये ज़मीं
कुछ इसका अब सिंघार कर

अजीब आदमी था वो

वो ज़िंदगी के सारे ग़म
तमाम दुख
हर इक सितम से कहता था
मैं तुमसे जीत जाऊँगा
कि तुमको तो मिटा ही देगा
एक रोज़ आदमी
भुला ही देगा ये जहाँ
मिरी अलग है दास्ताँ

वो आँखें जिनमें ख्वाब हैं
वो दिल है जिनमें आरज़ू
वो बाज़ू जिनमें है सकत
वो होंठ जिनपे लफ्ज़ हैं
रहूँगा उनके दरमियाँ
कि जब मैं बीत जाऊँगा

अजीब आदमी था वो।