Hindi Poetry

Javed Akhtar – Bazahir kya hai jo haasil nahi hai


बज़ाहिर क्या है जो हासिल नहीं है
मगर ये तो मिरी मंज़ल नहीं है

ये तोदा रेत का है, बीच दरिया
ये बह जाएगा ये साहिल नहीं है

बहुत आसान है पहचान इसकी
अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है

मुसाफ़र वो अजब है कारवाँ में
कि जो हमराह है शामिल नहीं है

बस इक मक़तूल ही मक़्तूल कब है
बस इक क़ातिल ही तो क़ातिल नहीं है

कभी तो रात को तुम रात कह दो
ये काम इतना भी अब मुश्किल नहीं है