Hindi Poetry

Javed Akhtar – Fsaad ke baad


गहरा सन्नाटा है
कुछ मकानों से ख़ामेश उठता हुआ
गाढ़ा काला धुआँ
मैल दिल में लिए
हर तरफ़ दूर तक फैलता जाता है
गहरा सन्नाटा है

लाश की तरह बैजान हे रास्ता
एक टुटा हुआ ठेला
उल्टा पड़ा
अपने पहिये हवा में उठाए हुए
आसमानों को हैरत से ताकता है
जैसे कि जो भी हुआ
उसका अब तक यक़ीं इसको आया नहीं
गहरा सन्नाटा है

एक उजड़ी दुकाँ
चीख़ के बाद मुँह
जो खुला का खुला रह गया
अबने टूटे कीवाड़ों से वो
दूर तक फैले
चूड़ी के टुकड़ों को
हसरतज़दा नज़रों से देखती है
कि कल तक यही शीशे
इस पोपले के मुँह में
सौ रंग के दाँत थे
गहरा सन्नाटा है

गहरे सन्नाटे ने अपने मंज़र से युँ बात की
सुन ले उजड़ी दुकाँ
ए सुलगते मकाँ
टुटे ठेले
तुम्ही बस नहीं हो अकेले
यहाँ और भी हैं
जो ग़ारत हुए हैं
हम इनका भी मातम करेंगे
मगर पहले उनको तो रो लें
कि जो लूटने आए थे
और ख़ुद लुट गए
क्या लूटा
इसकी उनको ख़बर ही नहीं
कमनज़र है
कि सदियों की तहज़ीब पर
उन बेचारों की कोइ नज़र ही नहीं।