Hindi Poetry

Javed Akhtar – Zurm aur Szaa


हाँ गुनहगार हूँ मैं
जो सज़ा चाहे अदालत देदे
आपके सामने सरकार हूँ मैं

मुझको इकरार
कि मैंने इक दिन
ख़ुद को नीलाम किया
और राज़ी-बरज़ा
सरेबाज़ार, सरेआम किया
मुझको कीमत भी बहुत ख़ूब मिली थी लेकिन
मैंने सौदे में ख़यानत कर ली
यानी
कुछ ख़्वाब बचाकर रक्खे
मैंने सोचा था
किसे फ़ुरसत है
जो मिरी रूह, मिरे दिल की तलाशी लेगा
मैंने सोचा था
किसे होगी ख़बर
कितना नादान था मैं
ख़्वाब
छुप सकते हैं क्या
रौशनी
मुट्ठी में रुक सकती है क्या
वो जो होना था
हुआ
आपके सामने सरकार हूँ मैं
जो सज़ा चाहे अदालत देदे
फ़ैसला सुनने को तैयार हूँ मैं
हाँ गुनहगार हूँ मैं

फ़ैसला ये है अदालत का
तिरे सारे ख़्वाब
आज से तिरे नहीं है मुजरिम!
ज़हन के सारे सफ़र
और तिरे दिल की परवाज़
जिस्म में बहते लहू के नग़में
रूह का साज़
समाअत
आवाज़
आज से तेरे नहीं है मुजरिम!
वस्ल की सारी हदीसें
ग़मे हिज्राँ की किताब
तेरी यादों के गुलाब
तेरा एहसास
तिरी फ़िक्रो नज़र
तेरी सब साअतें
सब लम्हे तिरे
रोज़ो-शब, शामो-सहर
आज से तेरे नहीं है मुजरिम!
ये तो इनसाफ़ हुआ तेरी ख़रीदारों से
औक अब तेरी सज़ा
तुझे मरने की इजाज़त नहीं
जीना होगा।