Ramdhari Singh Dinkar – Mirch ka mzaa
मिर्च का मज़ा एक काबुली वाले की कहते हैं लोग कहानी, लाल मिर्च को देख गया भर उसके मुँह में
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मिर्च का मज़ा एक काबुली वाले की कहते हैं लोग कहानी, लाल मिर्च को देख गया भर उसके मुँह में
Read Moreध्वज-वंदना नमो, नमो, नमो… नमो स्वतंत्र भारत की ध्वजा, नमो, नमो! नमो नगाधिराज-शृंग की विहारिणी! नमो अनंत सौख्य-शक्ति-शील-धारिणी! प्रणय-प्रसारिणी, नमो
Read Moreजियो जियो अय हिन्दुस्तान जाग रहे हम वीर जवान, जियो जियो अय हिन्दुस्तान ! हम प्रभात की नई किरण हैं,
Read Moreएक पत्र मैं चरणॊं से लिपट रहा था, सिर से मुझे लगाया क्यों? पूजा का साहित्य पुजारी पर इस भाँति
Read Moreतन्तुकार भू पर कटु रव कर्कश, अपार, ऊपर अम्बर में धूम, क्षार । श्रमियों का कर शोषण, विनाश, चिमनियाँ छोड़तीं
Read Moreसर्ग-संदेश देशों में यदि सर्वोच्च देश बनना चाहो, पहले, सबसे बढ़ कर, भारत को प्यार करो । है चकित विश्व
Read Moreबरगद निश्चिन्त चारुजल ताल-तीर है खड़ा एक बरगद गम्भीर, पत्ते-पत्ते में सघन, श्यामद्युति हरियाली । डोलता दिवस भर छवि बिखेर,
Read Moreउर्वशी काव्य की समाप्ति (उर्वशी काव्य के पूर्ण होने पर पंत जी को लिखा गया एक पत्र) मान्यवर ! आप
Read Moreप्रण-भंग विश्व-विभव की अमर वेलि पर फूलों-सा खिलना तेरा। शक्ति-यान पर चढ़कर वह उन्नति-रवि से मिलना तेरा। भारत ! क्रूर
Read Moreपूर्वाभास हाय ! विभव के उस पद में नियति-भीषिका की मुसकान जान न सकी भोग में भूली- सी तेरी प्यारी
Read Moreहमारे कृषक जेठ हो कि हो पूस, हमारे कृषकों को आराम नहीं है छूटे कभी संग बैलों का ऐसा कोई
Read Moreविजयी के सदृश जियो रे वैराग्य छोड़ बाँहों की विभा संभालो चट्टानों की छाती से दूध निकालो है रुकी जहाँ
Read Moreकलम या कि तलवार दो में से क्या तुम्हे चाहिए कलम या कि तलवार मन में ऊँचे भाव कि तन
Read Moreराजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी राजा वसन्त वर्षा ऋतुओं की रानी लेकिन दोनों की कितनी भिन्न कहानी राजा के
Read Moreशक्ति और क्षमा क्षमा, दया, तप, त्याग, मनोबल सबका लिया सहारा पर नर व्याघ्र सुयोधन तुमसे कहो, कहाँ, कब हारा?
Read Moreमनुष्यता है बहुत बरसी धरित्री पर अमृत की धार; पर नहीं अब तक सुशीतल हो सका संसार । भोग लिप्सा
Read Moreअन्तर्वासिनी अधखिले पद्म पर मौन खड़ी तुम कौन प्राण के सर में री? भीगने नहीं देती पद की अरुणिमा सुनील
Read Moreअगेय की ओर गायक, गान, गेय से आगे मैं अगेय स्वन का श्रोता मन। सुनना श्रवण चाहते अब तक भेद
Read Moreये गान बहुत रोये तुम बसे नहीं इनमें आकर, ये गान बहुत रोये । बिजली बन घन में रोज हँसा
Read Moreबर्र और बालक सो रहा था बर्र एक कहीं एक फूल पर, चुपचाप आके एक बालक ने छू दिया. बर्र
Read Moreसाथी उसे भी देख, जो भीतर भरा अंगार है साथी। (1) सियाही देखता है, देखता है तू अन्धेरे को, किरण
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