Faiz Ahmed Faiz – August 1944
अगस्त १९५५
शहर में चाक-गरेबाँ हुए नापैद अबके
कोई करता ही नहीं ज़ब्त की ताकीद अबके
लुत्फ़ कर, ऐ निगहे-यार, कि ग़मवालों ने
हसरते-दिल की उठाई नहीं तमहीद अबके
चाँद देखा तेरी आँखों में, न होठों पे शफ़क़
मिलती-जुलती है शबे-ग़म से तिरी दीद अबके
दिल दुखा है न वह पहला-सा, न जाँ तड़पी है
हम ही ग़ाफ़िल थे कि आई ही नहीं ईद अबके
फिर से बुझ जाएँगी शमएँ जो हवा तेज़ चली
लाके रक्खो सरे-महफ़िल कोई ख़ुरशीद अबके
कराची, १४ अगस्त १९५५
(ताकीद=आदेश, तमहीद=भूमिका, ख़ुरशीद=सूरज)