Faiz Ahmed Faiz – Sre-aagaaz
सरे-आग़ाज़
शायद कभी अफ़्शा हो निगाहों पे तुम्हारी
हर सादा वरक़ जिस सुख़न-ए-कुश्ता से ख़ूँ है
शायद कभी इत गीत का परचम हो सरफ़राज़
जो आमद-ए-सरसर की तमन्ना में निगूँ है
शायद कभी इस दिल की कोई रग तुम्हें चुभ जाए
जो संग-ए-सर-ए-राह की मानिंद निगूँ है ।
(अफ़शा=प्रकट, सुख़न-ए-कुश्ता=ज़ख़्मी शब्द,
सरफ़राज़=सिर ऊँचा करने वाला, आमद-ए-
सरसर=आँधी आनी, ज़बूं =गंधला, संग-ए-
सर-ए-राह=रास्ते का पत्थर)
सरफ़राज़=सिर ऊँचा करने वाला, आमद-ए-
सरसर=आँधी आनी, ज़बूं =गंधला, संग-ए-
सर-ए-राह=रास्ते का पत्थर)