Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Graari-e-shbe hijran duchand kya krte


गरानी-ए-शबे-हिज्राँ दुचंद क्या करते

गरानी-ए-शबे-हिज्राँ दुचंद क्या करते
इलाजे-दर्द तेरे दर्दमंद क्या करते

वहीं लगी है जो नाज़ुक मकाम थे दिल के
ये फ़र्क़ दस्ते-अदू के गज़ंद क्या करते

जगह-जगह पे थे नासेह तो कू-ब-कू दिलबर
इन्हें पसंद, उन्हें नापसंद क्या करते

हमीं ने रोक लिया पंजा-ए-जुनूँ को वरना
हमें असीर ये कोताहकमंद क्या करते

जिन्हें ख़बर थी कि शर्ते-नवागरी क्या है
वो ख़ुशनवा गिला-ए-क़ैदो-बंद क्या करते

गुलू-ए-इश्क़ को दारो-रसन पहुँच न सके
तो लौट आए तेरे सरबलंद, क्या करते

(गरानी-ए-शबे-हिज्राँ=विरह की रात का
बोझ, दुचन्द=दोगुना, गज़न्द=बरछा, शर्ते-
नवागरी=गाने की शर्त, दारो-रसन=फासी
का फंदा, सरबलन्द=ग़ैरतमन्द)