Faiz Ahmed Faiz – Kya karein
क्या करें
मिरी तिरी निगाह में
जो लाख इंतज़ार हैं
जो मेरे तेरे तन बदन में
लाख दिल फ़िगार हैं
जो मेरी तेरी उंगलियों की बेहिसी से
सब कल्म नज़ार हैं
जो मेरे तेरे शहर की
हर इक गली में
मेरे तेरे नक़्शे-पा के बेनिशां मज़ार हैं
जो मेरी तेरी रात के
सितारे ज़ख़्म-ज़ख़्म हैं
जो मेरी तेरी सुबह के
गुलाब चाक-चाक हैं
ये ज़ख़्म सारे बेदवा
ये चाक सारे बेरफ़ू
किसी पे राख चांद की
किसी पे ओस का लहू
ये है भी या नहीं बता
ये है कि महज़ जाल है
मिरे तुम्हारे अंकबूते-वहम का बुना हुआ
जो है तो इसका क्या करें
नहीं है तो भी क्या करें
बता, बता
बता, बता
बेरूत, १९८०
(फ़िगार=ज़ख़्मी, बेहिसी=अहसासहीन,
नज़ार=कमज़ोर, अंकबूत=मकड़ी)
नज़ार=कमज़ोर, अंकबूत=मकड़ी)