Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Filistin ke liye


फ़लिसतीन के लिए -१

(फ़लिसतीनी शुहुदा जो परदेस में काम आये)

मै जहां पर भी गया अरज़े-वतन
तेरी तज़लील के दाग़ों की जलन दिल में लिये
तेरी हुरमत के चराग़ों की लगन दिल में लिये
तेरी उलफ़त, तेरी यादों की कसक साथ गई
तेरे नारंज शगूफ़ों की महक साथ गई
सारे अनदेखे रफ़ीकों का जिलौ साथ रहा
कितने हाथों से हम-आग़ोश मिरा हाथ रहा
दूर परदेस की बेमेहर गुज़रगाहों में
अजनबी शहर की बेनामो-निशां राहों में
जिस ज़मीं पर भी खुला मेरे लहू का परचम
लहलहाता है वहां अरज़े-फ़लिसतीं का अलम
तेरे आदा ने किया एक फ़लिसतीं बर्बाद
मेरे ज़ख़्मों ने किये कितने फ़लिसतीं आबाद

बेरूत, १९८०

(तज़लील=अपमान, हुरमत=निर्मलता, नारंज=नारंगी,
शगूफ़ों=कलियों, जिलौ=लगाम, परचम=झंडा, अरज़े=
धरती, अलम=झंडा, आदा=दुश्मन)