Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Koi aashiq kisi mehbooba se


कोई आशिक किसी महबूबा से

गुलशने-याद में गर आज दमे-बादे-सबा
फिर से चाहे कि गुल-अफ़शां हो तो हो जाने दो
उमरे-रफ़ता के किसी ताक पे बिसरा हुआ दर्द
फिर से चाहे कि फ़रोज़ां हो तो हो जाने दो

जैसे बेगाना से अब मिलते हो वैसे ही सही
आयो दो चार घड़ी मेरे मुकाबिल बैठो
गर्चे मिल बैठेंगे हम तुम तो मुलाकात के बाद
अपना अहसासे-ज़ियां और ज़ियादा होगा
हमसुख़न होंगे जो हम दोनों तो हर बात के बीच
अनकही बात का मौहूम-सा पर्दा होगा
कोई इकरार न मैं याद दिलाऊंगा न तुम
कोई मज़मून वफ़ा का न जफ़ा का होगा

गर्दे-अय्याम की तहरीर को धोने के लिए
तुम से गोया हों दमे-दीद जो मेरी पलकें
तुम जो चाहो वो सुनो
और जो न चाहो न सुनो
और जो हर्फ़ करें मुझ से गुरेज़ां आंखें
तुम जो चाहो तो कहो
और जो न चाहो न कहो

लन्दन, १९७८

(दमे-बादे-सबा=हवा का झोंका,
गुल-अफ़शां=फूल बिखेरना, फ़रोज़ां=
रौशन, अहसासे-ज़ियां=खो जाने का
एहसास, मौहूम=हल्का, गर्दे-अय्याम=
युग, गुरेज़ां=बचना)