Faiz Ahmed Faiz – Dashte Khizaan mein
दश्ते-ख़िज़ाँ में
दश्ते-ख़िज़ाँ में जिस दम फैले
रुख़्सते-फ़स्ले-गुल की ख़ुशबू
सुभ के चश्मे पर जब पहुँचे
प्यास का मारा रात का आहू
यादों के ख़ाशाक में जागे
शौक़ के अंगारों का जादू
शायद पल-भर को लौट आए
उम्रे-गुज़िश्ता, वस्ले-मनो-तू
बेरूत, मई, १९८२
(दश्ते-ख़िज़ाँ=पतझर का जंगल,
रुख़्सते-फ़स्ले-गुल=बीतती हुई
बहार, आहू=हिरन, ख़ाशाक=कूड़ा-
करकट, उम्रे-गुज़िश्ता=बीती हुई
उम्र, वस्ले-मनो-तू=मेरा-तुम्हारा
मिलन)
रुख़्सते-फ़स्ले-गुल=बीतती हुई
बहार, आहू=हिरन, ख़ाशाक=कूड़ा-
करकट, उम्रे-गुज़िश्ता=बीती हुई
उम्र, वस्ले-मनो-तू=मेरा-तुम्हारा
मिलन)