Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Hum saada hi aise the


हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई

हम सादा ही ऐसे थे की यूं ही पज़ीराई
जिस बार ख़िजां आई समझे कि बहार आई

आशोबे-नज़र से की हमने चमन-आराई,
जो शै भी नज़र आई गुलरंग नज़र आई

उमीदे-तलत्तुफ़ में रंजीदा रहे दोनों-
तू और तिरी महफ़िल, मैं और मिरी तनहाई

वां मिल्लते-बुलहवसां और शोरे-वफ़ाजूई
यां ख़िलवते-कमसुख़नां और लज़्ज़ते-रुसवाई

यकजान न हो सकिये, अनजान न बन सकिये
यों टूट गई दिल में शमशीरे-शनासाई

इस तन की तरफ़ देखो जो कत्लगहे-दिल है
क्या रक्खा है मकत्ल में, ऐ चश्मे-तमाशाई

(आशोबे-नज़र=नज़र की लाली, तलत्तुफ़=
मिलने का आनंद, मिल्लते-बुलहवसां=वासना
के लोभी का समाज, शोरे-वफ़ाजूई=प्रेम-मोहब्बत
के प्रचार का कोलाहल, ख़िलवते-कमसुख़नां=कम
बोलने वालों का एकांत, शनासाई=जान पहचान)

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