Faiz Ahmed Faiz – Nazar-e-hasrat mohini
नज़र-ए-हसरत मोहानी
मर जायेंगे ज़ालिम कि हिमायत न करेंगे
अहरार कभी तरके-रवायत न करेंगे
क्या कुछ न मिला है जो कभी तुझसे मिले थे
अब तेरे न मिलने की शिकायत न करेंगे
शब बीत गई है तो गुज़र जायेगा दिन भी,
हर लहज़ा जो गुज़री वो हिकायत न करेंगे
ये फ़िकर दिले-ज़ार का एवज़ाना बहुत है
शाही नहीं मांगेंगे विलायत न करेंगे
हम शैख़ न लीडर न मुसाहिब न सहाफ़ी
जो ख़ुद नहीं करते वो हिदायत न करेंगे
(अहरार=आज़ाद लोग, हिकायत=बयान,
एवज़ाना=बदल, सहाफ़ी=पत्रकार)
एवज़ाना=बदल, सहाफ़ी=पत्रकार)