Hindi Poetry

Faiz Ahmed Faiz – Yeh mausme-gul gar che tarbkhej bohat hai


यह मौसमे-गुल गर चे तरबख़ेज़ बहुत है

यह मौसमे-गुल गर चे तरबख़ेज़ बहुत है
अहवाले गुल-ओ-लाला ग़म-अँगेज़ बहुत है

ख़ुश दावते-याराँ भी है यलग़ारे-अदू भी
क्या कीजिए दिल का जो कम-आमेज़ बहुत है

यूँ पीरे-मुग़ाँ शैख़े-हरम से हुए यकजाँ
मयख़ाने में कमज़र्फ़िए परहेज़ बहुत है

इक गर्दने-मख़लूक़ जो हर हाल में ख़म है
इक बाज़ु-ए-क़ातिल है कि ख़ूंरेज़ बहुत है

क्यों मश’अले दिल ‘फ़ैज़’ छुपाओ तहे-दामाँ
बुझ जाएगी यूँ भी कि हवा तेज़ बहुत है

(तरबख़ेज़=आनंद बढ़ाने वाला, ग़मअंगेज़=
दुख देने वाला, यलग़ारे-उदू=दुश्मन का हमला,
कमआमेज़=मिलना-जुलना कम पसंद करने
वाला, पीरे-मुग़ाँ=पीने वालों के सर्दार, शैख़े-
हरम=धर्म गुरू, यकजाँ=एकजुट, कमज़र्फ़िए=
तंगदिली, मख़लूक=जनता, ख़म=झुकी हुई,
ख़ूंरेज़=लहू वहाने वाला, मशअले=मशाल)