Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Gham ae duniya se agar paayi bhi toh Fursat


ग़म-ए-दुनिया से गर पायी भी फ़ुरसत सर उठाने की
फ़लक का देखना तकरीब तेरे याद आने की

खुलेगा किस तरह मज़मूं मेरे मकतूब का यारब
कसम खायी है उस काफ़िर ने काग़ज़ के जलाने की

लिपटना परनियां में शोला-ए-आतिश का आसां है
वले मुशिकल है हिकमत दिल में सोज़-ए-ग़म छुपाने की

उन्हें मंज़ूर अपने ज़ख़्म्यों का देख आना था
उठे थे सैर-ए-गुल को देखना शोख़ी बहाने की

हमारी सादगी थी इलतफ़ात-ए-नाज़ पर मरना
तेरा आना न था ज़ालिम मगर तमहीद जाने की

लकद कूब-ए-हवादिस का तहम्मुल कर नहीं सकती
मेरी ताकत कि ज़ामिन थी बुतों के नाज़ उठाने की

कहूं क्या ख़ूबी-ए-औज़ा-ए-अबना-ए-ज़मां ‘ग़ालिब’
बदी की उसने जिस से हमने की थी बारहा नेकी