Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Shikve ke naam se be mehar khafaa hota hai


शिकवे के नाम से बे-मेहर ख़फ़ा होता है
ये भी मत कह कि जो कहये तो गिला होता है

पुर हूं मैं शिकवा से यूं, राग से जैसे बाजा
इक ज़रा छेड़िये, फिर देखिये क्या होता है

गो समझता नहीं पर हुसने-तलाफ़ी देखो!
शिकवा-ए-ज़ौर से सरगरम-ए-जफ़ा होता है

इशक की राह में है, चरख़-ए-मकोकब की वो चाल
सुसत-रौ जैसे कोई आबला-पा होता है

कयूं न ठहरें हदफ़-ए-नावक-ए-बेदाद कि हम
आप उठा लाते हैं गर तीर ख़ता होता है

ख़ूब था पहले से होते जो हम अपने बदख़वाह
कि भला चाहते हैं, और बुरा होता है

नाला जाता था, परे अरश से मेरा, और अब
लब तक आता है जो ऐसा ही रसा होता है

ख़ामा मेरा कि वह है बारबुद-ए-बज़म-ए-सुख़न
शाह की मदह में यूं नग़मा-सरा होता है

ऐ शहनशाह-ए-कवाकिब सिपह-ओ-मेहर-अलम
तेरे इकराम का हक किस से अदा होता है

सात इकलीम का हासिल जो फ़राहम कीजे
तो वह लशकर का तेरे, नाल-ए-बहा होता है

हर महीने में जो यह बदर से होता है हिलाल
आसतां पर तेरे यह नासिया-सा होता है

मैं जो गुसताख़ हूं आईना-ए-ग़ज़ल-ख़वानी में
यह भी तेरा ही करम ज़ौक-फ़िज़ा होता है

रखियो ”ग़ालिब” मुझे इस तलख़-नवायी से मुआ्आफ़
आज कुछ दर्द मेरे दिल में सिवा होता है