Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Arz ae niyaaz ae ishq ke kaabil nahi raha


अरज़-ए-नियाज़-ए-इशक के काबिल नहीं रहा
जिस दिल पे नाज़ था मुझे, वो दिल नहीं रहा

जाता हूं दाग़-ए-हसरत-ए-हसती लिये हुए
हूं शमअ-ए-कुशता दरख़ुर-ए-महफ़िल नहीं रहा

मरने की ऐ दिल और ही तदबीर कर कि मैं
शायाने-दसत-ओ-खंजर-ए-कातिल नहीं रहा

बर-रू-ए-शश-जहत दर-ए-आईनाबाज़ है
यां इमतियाज़-ए-नाकिस-ओ-कामिल नहीं रहा

वा कर दिये हैं शौक ने बन्द-ए-नकाब-ए-हुसन
ग़ैर अज़ निगाह अब कोई हायल नहीं रहा

गो मैं रहा रहीन-ए-सितम-हाए-रोज़गार
लेकिन तेरे ख़याल से ग़ाफ़िल नहीं रहा

दिल से हवा-ए-किशत-ए-वफ़ा मिट गया कि वां
हासिल सिवाये हसरत-ए-हासिल नहीं रहा

बेदाद-ए-इशक से नहीं ड्रता मगर ”असद”
जिस दिल पे नाज़ था मुझे वो दिल नहीं रहा