Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Tu dost kisi ka bhi sitamgaar na hua tha


तू दोसत किसी का भी सितमगर न हुआ था
औरों पे है वो ज़ुलम कि मुझ पर न हुआ था

छोड़ा मह-ए-नख़शब की तरह दसत-ए-कज़ा ने
ख़ुरशीद हनूज़ उस के बराबर न हुआ था

तौफ़ीक बअन्दाज़ा-ए-हंमत है अज़ल से
आंखों में है वो कतरा कि गौहर न हुआ था

जब तक की न देखा था कद-ए-यार का आलम
मैं मुअतकिद-ए-फ़ितना-ए-महशर न हुआ था

मैं सादा-दिल, आज़ुरदगी-ए-यार से ख़ुश हूं
यानी सबक-ए-शौक मुकर्रर न हुआ था

दरिया-ए-मआसी तुनुक-आबी से हुआ ख़ुशक
मेरा सर-ए-दामन भी अभी तर न हुआ था

जारी थी ‘असद’ दाग़-ए-जिगर से मेरी तहसील
आतिशकदा जागीर-ए-समन्दर न हुआ था