Javed Akhtar – Sheyar
(1)
पुरसुकूं लगती है कितनी झील के पानी पे बत
पैरों की बेताबियाँ पानी के अंदर देखिए।
(2)
जो दुश्मनी बखील से हुई तो इतनी खैर है
कि जहर उस के पास है मगर पिला नहीं रहा।
(3)
बहुत आसान है पहचान इसकी
अगर दुखता नहीं तो दिल नहीं है
(4)
फिर वो शक्ल पिघली तो हर शय में ढल गई जैसे
अजीब बात हुई है उसे भुलाने में
(5)
जो मुंतजिर न मिला वो तो हम हैं शर्मिंदा
कि हमने देर लगा दी पलट के आने में।
(6)
मेरा आँगन कितना कुशादा कितना बड़ा था
जिसमें मेरे सारे खेल समा जाते थे
(बत=बतख, कुशादा=फैला हुआ)