Hindi Poetry

Suryakant Tripathi Nirala – Manav ka mann shaant karo hey


 मानव का मन शान्त करो हे

मानव का मन शान्त करो हे!
काम, क्रोध, मद, लोभ दम्भ से
जीवन को एकान्त करो हे।

हिलें वासना-कृष्ण-तृष्ण उर,
खिलें विटप छाया-जल-सुमधुर,
गूंजे अलि-गुंजन के नूपुर,
निज-पुर-सीमा-प्रान्त करो हे।

विहग-विहग नव गगन हिला दे,
गान खुले-कण्ठ-स्वर गा दे,
नभ-नभ कानन-कानन छा दे,
ऐसे तुम निष्क्रान्त करो हे।

रूखे-मुख की रेखा सोये,
फूट-फूटकर माया रोये,
मानस-सलिल-मलिनता धोये,
प्रति मग से आक्रान्त करो हे!