Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Shok har rang rakibo saro saman nikla


शौक हर रंग, रकीबे-सरो-सामां निकला
कैस तसवीर के परदे में भी उरीयां निकला

ज़ख़्म ने दाद न दी तंगीए-दिल की या रब
तीर भी सीना-ए-बिसमिल से पर-अफ़शां निकला

बूए-गुल, नाला-ए-दिल, दूदे-चराग़े-महफ़िल
जो तिरी बज़म से निकला, सो परीशां निकला

दिले-हसरतज़दा था मायद-ए-लज़्ज़ते-दर्द
काम यारों का, बकदरे-लबो-दन्दां निकला

है नौआमोज़े-फ़ना, हिंमते-दुशवार-पसन्द

सख़त मुशकिल है, कि यह काम भी आसां निकला

दिल में फिर गिरीए ने जोर (शोर) उठाया, ‘ग़ालिब’

आह जो कतरा न निकला था, सो तूफ़ां निकला