Hindi Poetry

Mirza Ghalib – Yeh na thi hmaari kismat ki visale-yaar hota


ये न थी हमारी किस्मत कि विसाले-यार होता
अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता

तेरे वादे पे जीये हम तो ये जान झूठ जाना
कि ख़ुशी से मर न जाते अगर ऐतबार होता

तेरी नाज़ुकी से जाना कि बंधा था अहद बोदा
कभी तू न तोड़ सकता अगर उसतुवार होता

कोई मेरे दिल से पूछे तेरे तीरे-नीमकश को
ये खलिश कहां से होती जो जिगर के पार होता

ये कहां की दोसती है कि बने हैं दोसत नासेह
कोई चारासाज़ होता, कोई ग़मगुसार होता

रगे-संग से टपकता वे लहू कि फिर न थमता
जिसे ग़म समझ रहे हो ये अगर शरार होता

ग़म अगरचे जां-गुसिल है, पर कहां बचे कि दिल है
ग़मे-इशक ‘गर न होता, ग़मे-रोज़गार होता

कहूं किससे मैं कि क्या है, शबे-ग़म बुरी बला है
मुझे क्या बुरा था मरना ? अगर एक बार होता

हुए मर के हम जो रुसवा, हुए कयों न ग़रके-दरिया

न कभी जनाज़ा उठता, न कहीं मज़ार होता

उसे कौन देख सकता, कि यग़ाना है वो यकता

जो दुयी की बू भी होती तो कहीं दो चार होता

ये मसाईले-तसव्वुफ़, ये तेरा बयान ‘ग़ालिब’

तुझे हम वली समझते, जो न बादाख़वार होता