Mirza Ghalib – Woh firaak aur woh visaal kahan
वो फ़िराक और वो विसाल कहां
वो शब-ओ-रोज़-ओ-माह-ओ-साल कहां
फ़ुरसत-ए-कारोबार-ए-शौक किसे
जौक-ए-नज़्ज़ारा-ए-जमाल कहां
दिल तो दिल वो दिमाग़ भी न रहा
शोर-ए-सौदा-ए-ख़त्त-ओ-ख़ाल कहां
थी वो इक शखस के तसव्वुर से
अब वो रानाई-ए-ख़याल कहां
ऐसा आसां नहीं लहू रोना
दिल में ताकत जिगर में हाल कहां
हमसे छूटा किमारख़ाना-ए-इशक
वां जो जावें, गिरह में माल कहां
फ़िक्र-ए-दुनिया में सर खपाता हूं
मैं कहां और ये वबाल कहां
मुज़मंहल हो गये कुवा ‘ग़ालिब’
वो अनासिर में एतदाल कहां