Atal Bihari Vajpayee – Manushya

पृथिवी पर
मनुष्य ही ऐसा एक प्राणी है,
जो भीड़ में अकेला, और,
अकेले में भीड़ से घिरा अनुभव करता है ।

मनुष्य को झुण्ड में रहना पसंद है ।
घर-परिवार से प्रारम्भ कर,
वह बस्तियाँ बसाता है ।
गली-ग्राम-पुर-नगर सजाता है ।

सभ्यता की निष्ठुर दौड़ में,
संस्कृति को पीछे छोड़ता हुआ,
प्रकृति पर विजय,
मृत्यु को मुट्ठी में करना चाहता है ।

अपनी रक्षा के लिए
औरों के विनाश के सामान जुटाता है ।
आकाश को अभिशप्त,
धरती को निर्वसन,
वायु को विषाक्त,
जल को दूषित करने में संकोच नहीं करता ।

किंतु, यह सब कुछ करने के बाद
जब वह एकान्त में बैठकर विचार करता है,
वह एकान्त, फिर घर का कोना हो,
या कोलाहल से भरा बाजार,
या प्रकाश की गति से तेज उड़ता जहाज,
या कोई वैज्ञानिक प्रयोगशाला,
था मंदिर
या मरघट ।

जब वह आत्मालोचन करता है,
मन की परतें खोलता है,
स्वयं से बोलता है,
हानि-लाभ का लेखा-जोखा नहीं,
क्या खोया, क्या पाया का हिसाब भी नहीं,
जब वह पूरी जिंदगी को ही तौलता है,
अपनी कसौटी पर स्वयं को ही कसता है,
निर्ममता से निरखता, परखता है,
तब वह अपने मन से क्या कहता है !
इसी का महत्त्व है, यही उसका सत्य है ।

अंतिम यात्रा के अवसर पर,
विदा की वेला में,
जब सबका साथ छूटने लगता है,
शरीर भी साथ नहीं देता,
तब आत्मग्लानि से मुक्त
यदि कोई हाथ उठाकर यह कह सकता है
कि उसने जीवन में जो कुछ किया,
सही समझकर किया,
किसी को जानबूझकर चोट पहुँचाने के लिए नहीं,
सहज कर्म समझकर किया,
तो उसका अस्तित्व सार्थक है,
उसका जीवन सफ़ल है ।

उसी के लिए यह कहावत बनी है,
मन चंगा तो कठौती में गंगाजल है ।